अभयारिष्ट कब पीना चाहिए, अभयारिष्ट सिरप के फायदे और नुकसान

अभयारिष्ट प्रमुख तौर पर बवासीर, कब्ज और भगंदर की अवस्था में इसका प्रयोग किया जाता है, पर पाचन तंत्र और मूत्र मार्ग से संबंधित, विभिन्न समस्याओं को भी दूर करने में अत्यंत लाभदायक परिणाम इसका रहता है,और मैं प्रमुख तौर, पर इस औषधि का प्रयोग प्रमेह रोग में बहुत ही सफलता के साथ काफी लंबे समय से करता आ रहा हूं।

आखिर क्या है अभयारिष्ट? क्या कुछ इसके घटक द्रव्य हैं? किस प्रकार यह कार्य करती है? क्या क्या इसके लाभ हैं? और इसे लेने की सर्वश्रेष्ठ विधि क्या है? और साथ ही साथ इसे प्रयोग करते समय बरते जाने वाली कौन-कौन सी वो सावधानियां हैं, जिनको हमेशा हमें दिमाग में रखना चाहिए। इन सभी सवालों के जवाब आज, के इस आर्टिकल में आपको विस्तार के साथ प्राप्त होने वाले हैं। और मैं एक बात पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि यह आर्टिकल पढ़ने के पश्चात, आपको अभयारिष्ट के संबंध में अन्य कोई आर्टिकल पढ़ने की आवश्यकता नहीं रहेगी, क्योंकि अभयारिष्ट से जुड़ी संपूर्ण जानकारी, आज आपको इस आर्टिकल में प्राप्त होने वाली है।

अभयारिष्ट सिरप के घटक (Abhayarishta Ingredients)

अभयारिष्ट सीरप को अनेक आयुर्वेदिक कंपनियाँ बनती है जैसे बैद्यनाथ, डाबर, पतंजलि, धूतपापेश्वर आदि। और लगभग सभी के अभ्यारिष्ट सीरप में घटक द्रव्य सामान ही होते है। सर्वप्रथम जानते हैं अभयारिष्ट के प्रमुख घटक द्रव्य के बारे में। तो जैसा इसका नाम है, इसके नाम से आप समझ ही पा रहे होंगे, कि इस औषधि का प्रमुख घटक द्रव्य है – अभ्या अर्थात हरीतकी या हरड़। हरीतकी जो अपने आप में एक रसायन औषधि है। अपने सौम्य, विरेचक और भूख को बढ़ाने वाले, पाचन तंत्र को बल प्रदान करने वाले गुण के चलते बहुत ही प्रसिद्ध औषधि है। साथ ही साथ यह औषधि बड़े हुए पित्त को शांत करने का कार्य करती है। नेचुरल तौर पर antioxidant का कार्य करती है, और हरीतकी का प्रयोग कब्ज की अवस्था में, और दस्त लगने की अवस्था में, दोनों ही अवस्थाओं में किया जाता है. इसके प्रयोग से गैस बनने की समस्या, मल के साथ आव आने की समस्या, या फिर पाचन तंत्र संबंधी विभिन्न प्रकार के विकार, liver और spleen की कमजोरी दूर होती है।

द्राक्षा के फायदे (Draksha Ke Fayde in Hindi)

इसके अलावा,अभयारिष्ट का अगला प्रमुख घटक द्रव्य है। द्राक्षा जो स्वयं, एक मृदु विरेचक का कार्य करता है। शरीर को पोषण प्रदान करता है, भूख बढ़ाता है, खून बढ़ाता है, और शरीर के बल में वृद्धि करने का कार्य करता है। इसके अलावा, इसके अंदर वायविडंग का प्रयोग किया जाता है, जो कि क्रमिक रोग में बहुत ही प्रभावशाली औषधि है। इसके अलावा पाचन तंत्र को भी बल प्रदान करने का यह कार्य करती है।

गोखरू के फायदे (Gokhru Ke Fayde in Hindi)

अगले प्रमुख घटक द्रव्य का नाम है गोखरू, जो उत्साह और बल में वृद्धि करने का कार्य करता है। पेशाब खुलकर लेकर आने में सहायता करता है, जिसके परिणामस्वरुप, पेशाब के रास्ते से जुड़ी विभिन्न समस्याओं में अभयारिष्ट लाभदायक परिणाम दिखाती है। इन सबके अलावा इस औषधि में निशौध का भी प्रयोग किया जाता है, जो कि एक थोड़ी सी तीव्र विरेचक औषधि है। इसके प्रयोग से हमारी आंतों की गति बढ़ जाती है। वहीं इसमें धनियाँ का भी प्रयोग किया जाता है, जो प्रमुख तौर पर पित्त दोष अधिकता को शांत करने का कार्य करता है।

अभयारिष्ट के अन्य घटक

इन सबके अलावा अभयारिष्ट में इंद्रायण की जड़, जो कि एक तीव्र विरेचक है उसका प्रयोग किया जाता है। चव्य, सौंठ और सौंफ जो कि हमारे पाचन अग्नि को बल प्रदान करने का कार्य करती है। भूख अच्छे से लगाती हैं। साथ ही साथ खाया पिया हज़म करने में सहायता करती हैं। उनका भी इसके अंदर प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा इसके अंदर दंती मूल और मोचरस का प्रयोग किया जाता है, जिसके कारण मल के साथ आँव आने की समस्या में, अभ्यारिष्ट बहुत ही प्रभावी औषधि नजर आती है। इसके अलावा गुड़ और धाय के फूल आदि का प्रयोग, इन सभी औषधियों को अरिष्ट रूप में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है। जिनके कारण अन्य औषधियों के प्रभाव में प्रभावी वृद्धि नजर आती है।

अभयारिष्ट सिरप के फायदे (Abhayarishta Syrup Benefits in Hindi)

चलिए अब फायदे के विषय में जान लेते हैं। साथ ही साथ मैं आपको यह भी बताने का प्रयास करता हूं, कि आखिर अभयारिष्ट कार्य किस प्रकार करती है, किस प्रकार यह लाभ प्रदान करती है। अभयारिष्ट एक बहुत ही उत्तम सारक अर्थात मल को धक्का मारकर बाहर निकालने वाली, मूत्रल अर्थात पेशाब को खुलकर लेकर आने वाली पाचक औषधि है। इसका प्रयोग प्रमुख तौर पर कब्ज की अवस्था में किया जाता है।

यह अन्य तीव्र विरेचक औषधि के समान कार्य नहीं करती है। जिस कारण जो दुष्प्रभाव अन्य तीव्र विरेचक औषधीयों के चलते देखने पड़ते हैं जैसे मरोड़ उठना, आंतों में जलन का होना, उनका कमज़ोर हो जाना, आंतों के अंदर खुश्की आ जाना, आंतों की गति का मंद हो जाना। जिसके परिणामस्वरूप कब्ज की समस्या में एक बार तो लाभ प्राप्त हो जाता है, पर पीछे ही पीछे यह समस्या स्थाई रूप लेती जाती है। और जिसका परिणाम यह होता है, कि आंतों में मल एकत्रित होना प्रारंभ हो जाता है। जिसके कारण वहाँ आम विष उत्पन्न होना प्रारंभ हो जाता है और यही आम विष रक्त में अवशोषित होकर अनेकों अनेक रोगों का कारण बनता है। पर इस प्रकार की समस्याएं अभयारिष्ट के प्रयोग से नहीं उत्पन्न होती है।

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बल्कि अभयारिष्ट के सेवन से आंतों की जो गति है, वह फिर से पहले के समान सामान्य हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप आंतों में जमा मल और आम विष शरीर से बाहर निकल जाता है। जिसके चलते कब्ज की समस्या में न केवल तुरंत प्रभाव से लाभ की प्राप्ति होती है, बल्कि स्थाई लाभ हेतु भी अभयारिष्ट का प्रयोग निसंकोच होकर किया जा सकता है।

एक और खास बात अधिकतर विरेचक औषधीयों के विपरीत, जो कि बहुत सारे पानी को आंतों में एकत्रित करना प्रारंभ कर देते है, जिसके परिणामस्वरूप पेट तो साफ़ हो जाता है, पर मल दस्त के रूप में आता है। पर अभयारिष्ट ऐसा नहीं करती है, बल्कि आंतों की गति को सुचारू रूप से लेकर आने का कार्य करती है, जिसके कारण, कब्ज़ दूर होता है।

साथ ही साथ हमारे liver और spleen को भी यह बल प्रदान करती है। इसी कारण जलोदर की अवस्था में, जिसे आम भाषा में पेट में पानी भर जाने की समस्या कहा जाता है। इस अवस्था में अभयारिष्ट का प्रयोग अन्य आवश्यक औषधियों के साथ करवाने पर काफी अच्छे लाभ की प्राप्ति शीघ्र होती हुई दिखाई देती है।

इन सबके अलावा अभयारिष्ट के प्रयोग से अग्निमांध की समस्या दूर होती है। भूख खुलकर लगती है। खाया पीया अच्छी प्रकार से हजम होता है। साथ ही साथ अभयारिष्ट का प्रयोग बढ़े हुए पित्त को भी शांत करने का काम करता है।

अभयारिष्ट – बवासीर का रामबाण आयुर्वेदिक इलाज

इसके अलावा अभयारिष्ट के प्रयोग से बवासीर की समस्या में बहुत ही शीघ्र लाभ की प्राप्ति होती है। कब्ज को समाप्त करने वाले अपने प्रभावी गुण के चलते बवासीर की समस्या को और आगे बढ़ने से, अभयारिष्ट तो बहुत ही प्रभावी तरीके से तुरंत रोकती है। साथ ही साथ सूजन को कम करने के अपने गुण के चलते बवासीर के मस्सों को सुखाने का भी यह कार्य करना प्रारंभ कर देती है। जिसके परिणामस्वरूप अभयारिष्ट के प्रयोग से बहुत ही शीघ्र अर्ष अर्थात बवासीर की समस्या दूर हो जाती है। इसके अलावा परिकर्तिका रोग जिसे Fisher के नाम से जाना जाता है, ऐसी अवस्था में भी अभयारिष्ट के प्रयोग से बवासीर के समान ही लाभदायक परिणाम प्राप्त होते हैं।

कब्ज और पेशाब की समस्या में फायदा

इन सबके अलावा बहुत से रोगियों में कब्ज की समस्या के साथ साथ पेशाब खुलकर न आने की समस्या भी पाई जाती है। तो अभयारिष्ट के प्रयोग से पेशाब रुकने की समस्या दूर हो जाती है। पेशाब खुलकर आता है, मूत्र मार्ग से संबंधित बहुत सी समस्याएं इसके प्रयोग से दूर होती हैं। साथ ही साथ अभयारिष्ट शुक्र शोधन का भी कार्य करती है, और इस कारण के चलते भी मैं धात की समस्या में, प्रमेह रोग में इस औषधि का मुख्य तौर पर प्रयोग करवाना पसंद करता हुँ। और बहुत ही लाभदायक परिणाम प्राप्त होते है।

अभयारिष्ट के नुकसान (Abhayarishta Syrup Side Effects)

जहाँ तक बात है मात्रा की, तो 10 से 30ml की मात्रा में दिन में 2 से 3 बार इसका प्रयोग, भोजन के बाद बराबर मात्रा में पानी मिलाकर किया जा सकता है। बात करें सावधानियों की तो अभयारिष्ट लगभग एक निरापद औषधि है, परंतु बहुत अधिक मात्रा में इसका बहुत अधिक लंबे समय तक किया गया बिना निर्देशन में, बिना उचित निर्देशन में किया गया प्रयोग हानिकारक हो सकता है।

साधारण तौर पर अभयारिष्ट को अधिक से अधिक पांच से छह महीने लगातार प्रयोग करना चाहिए। और इस दौरान चिकित्सक द्वारा निर्देशित मात्रा को धीरे धीरे ज़्यादा या कम करने की आवश्यकता पड़ सकती है। अगर ऐसा न किया जाए, तो निश्चित तौर पर अभयारिष्ट भी अन्य विरेचक औषधीय के समान इसकी आदत लग सकती है, ऐसी संभावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसके अलावा अधिक मात्रा में प्रयोग करने पर दस्त वगैरह लगने की समस्या भी किसी किसी में देखने को मिल सकती है और अपने अनुलोमन गुण के चलते गर्भवती स्त्रियों में अभयारिष्ट का प्रयोग वर्जित है।

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